Thursday, January 1, 2009

" माँ तुम क्यूँ नही हो रोती? "

ये जो झर- झर बहते झरने है,
देखो, ये कुछ कहते है।
ये जो ओस की गीलीं बूंदे है,
देखो, ये करतीं है चीत्कार।
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार?

है मुझे पता, है पास तुम्हारे,
आंसूओं के कई खजाने।
क्यूँ तुम उन्हें यूँ छिपती हो?
पूंछते है वे, भी बार-बार
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार?


चाहा है, मैंने भी, फ़ुट-फ़ुट कर रोना,
थाम के तेरी आँचल का एक कोना।
पर देख तुझे, छिपती हूँ, आंसू हर बार।
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार ?