Thursday, January 17, 2013

निर्झारा सी विलुप्ति

पुरातन विश्व का एक नूतन जोड़
कथित जीवनी  छोड़
धरा के अंतर को बींध  कर
रही हृदय की गतिसीमा तोड़
और कितने संशिप्त में
रखे स्वांस की चाह
भावना कलंकित कर
निर्झारा सी विलुप्ति
नयनो के कुटीर को
मानो  हो रही बना
मुठिबंद संपत्ति
और व्यथा की
मृदुल छवि में जैसे
 वीरांगना जन्नति
कोलाहल की संतती
-- -- केया

Thursday, January 1, 2009

" माँ तुम क्यूँ नही हो रोती? "

ये जो झर- झर बहते झरने है,
देखो, ये कुछ कहते है।
ये जो ओस की गीलीं बूंदे है,
देखो, ये करतीं है चीत्कार।
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार?

है मुझे पता, है पास तुम्हारे,
आंसूओं के कई खजाने।
क्यूँ तुम उन्हें यूँ छिपती हो?
पूंछते है वे, भी बार-बार
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार?


चाहा है, मैंने भी, फ़ुट-फ़ुट कर रोना,
थाम के तेरी आँचल का एक कोना।
पर देख तुझे, छिपती हूँ, आंसू हर बार।
माँ, तुम क्यूँ नही हो रोती
जब रोता है सारा संसार ?

Tuesday, December 30, 2008

" यदि मैं एक वृक्ष होती "

यदि मैं एक
वृक्ष होती
तो ग्रीष्म
की ऊष्मा
जलाती मेरी शाखाएं।
और सर्दी
की ठिठुरन से
काँप उठते पत्ते मेरे।
लेकिन मेरी
छाव तले
होते खड़े
मुस्कुराते चेहरे कई।
और मेरी किसी
डाली से
बाँध कर, रस्सी कोई,
झूलतीं, दिन-भर
नन्ही- मुन्नी बच्चियां।

लेकिन एक दिवस
ले जाता कोई
काट कर
मुझ से, मेरी डालियाँ।
और मैं
छलका कर आंसू
करती बहुत
चीख- पुकार,
और दर्द से
काँप उठता
अंग-अंग मेरा
पर खड़ी-खड़ी
हसंती बहुत यह दुनिया।
आज नही हूँ
मैं वृक्ष कोई,
फिर भी नही
सुनता कोई,
मेरी चीख-पुकार।
आज भी तो
मेरे पास खड़ी
हंसती है यह दुनिया।


Friday, July 18, 2008

हे मीरा के श्याम

हे मीरा के श्याम
क्यूँ हो तुम खड़े
कर-कमलों में बांसुरी धरे ?

क्यूँ नही करते शंखनाद
जो किया था, तुमने
महाभारत में?
हे अर्जुन के सारथी
क्यूँ नही रचते,
एक और महाभारत?
देखो पतन की ओर चला
आज फिर से संपूर्ण भारत ।
रहोगे तुम कब तक सुप्त
उठो! देखो! हे श्याम जग को
क्या होने दोगे मानवता लुप्त ?
जीवित रहे मीरा, विष पिए ,
क्या तुम्हारी, वह शक्ति हुई लुप्त ?

मेरे प्यारे पिता

खुरदुरे हाथ का कोमल स्पर्श
और नही दे सकता कोई
जो सुबह मुझे उठाने
और रात को मुझे सुलाने
मेरे सिरहाने आकर
प्यारे पिता, तुम दे जाते हो
और कभी जब नींद न आए तो
प्यार से, सर पर,
हाथ फेर कर, मुझे
देर रात तक सहलाते हो .
स्वप्नों के आँचल में लिपटी
आँखे, सुबह जब, उठने से
जी चुराती है,
गर्म चाय की प्याली लाकर
सुबह प्यार से उठाते हो।
जीवन की हर परीक्षा में,
चाहे जीत हो ,
या हो हार,
तुम सदा मेरी पीठ थपथपाते हो
मेरा हर, दुःख - दर्द बाटते
और मेरे हर,
अटपटे चुटकुले पर हसतें ,
लेकिन अपना हर दर्द छिपाते हो.........