यदि मैं एक
वृक्ष होती
तो ग्रीष्म
की ऊष्मा
जलाती मेरी शाखाएं।
और सर्दी
की ठिठुरन से
काँप उठते पत्ते मेरे।
लेकिन मेरी
छाव तले
होते खड़े
मुस्कुराते चेहरे कई।
और मेरी किसी
डाली से
बाँध कर, रस्सी कोई,
झूलतीं, दिन-भर
नन्ही- मुन्नी बच्चियां।
लेकिन एक दिवस
ले जाता कोई
काट कर
मुझ से, मेरी डालियाँ।
और मैं
छलका कर आंसू
करती बहुत
चीख- पुकार,
और दर्द से
काँप उठता
अंग-अंग मेरा
पर खड़ी-खड़ी
हसंती बहुत यह दुनिया।
आज नही हूँ
मैं वृक्ष कोई,
फिर भी नही
सुनता कोई,
मेरी चीख-पुकार।
आज भी तो
मेरे पास खड़ी
हंसती है यह दुनिया।
Tuesday, December 30, 2008
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