Friday, July 18, 2008

हे मीरा के श्याम

हे मीरा के श्याम
क्यूँ हो तुम खड़े
कर-कमलों में बांसुरी धरे ?

क्यूँ नही करते शंखनाद
जो किया था, तुमने
महाभारत में?
हे अर्जुन के सारथी
क्यूँ नही रचते,
एक और महाभारत?
देखो पतन की ओर चला
आज फिर से संपूर्ण भारत ।
रहोगे तुम कब तक सुप्त
उठो! देखो! हे श्याम जग को
क्या होने दोगे मानवता लुप्त ?
जीवित रहे मीरा, विष पिए ,
क्या तुम्हारी, वह शक्ति हुई लुप्त ?

मेरे प्यारे पिता

खुरदुरे हाथ का कोमल स्पर्श
और नही दे सकता कोई
जो सुबह मुझे उठाने
और रात को मुझे सुलाने
मेरे सिरहाने आकर
प्यारे पिता, तुम दे जाते हो
और कभी जब नींद न आए तो
प्यार से, सर पर,
हाथ फेर कर, मुझे
देर रात तक सहलाते हो .
स्वप्नों के आँचल में लिपटी
आँखे, सुबह जब, उठने से
जी चुराती है,
गर्म चाय की प्याली लाकर
सुबह प्यार से उठाते हो।
जीवन की हर परीक्षा में,
चाहे जीत हो ,
या हो हार,
तुम सदा मेरी पीठ थपथपाते हो
मेरा हर, दुःख - दर्द बाटते
और मेरे हर,
अटपटे चुटकुले पर हसतें ,
लेकिन अपना हर दर्द छिपाते हो.........